जैसलमेर जिले के सीमावर्ती क्षेत्र स्थित मातेश्वरी तनोटराय मंदिर से जयपुर तक 725 किलोमीटर लंबी ओरण पदयात्रा मंगलवार सुबह 10:30 बजे विधिवत पूजा-अर्चना के साथ शुरू हुई। ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने की मांग को लेकर निकली इस पदयात्रा में सैकड़ों पर्यावरणप्रेमी, पशुपालक और ग्रामीण शामिल हुए हैं, जो लगभग 30 दिनों की पदयात्रा कर राजधानी जयपुर पहुंचेंगे।
तीन माह की समयसीमा पूरी, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई
टीम ओरण के सुमेर सिंह सांवता ने बताया कि पूर्व में जिला प्रशासन द्वारा ओरणों को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने के लिए तीन माह का समय मांगा गया था, जिसकी अवधि 19 जनवरी को समाप्त हो चुकी है। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, जिससे जैसलमेर सहित पूरे पश्चिमी राजस्थान में भारी आक्रोश है। इसी कारण इस बार जनता ने स्वयं जयपुर पहुंचकर सरकार के समक्ष अपनी मांग रखने का निर्णय लिया है।
रास्ते में होंगी ओरण सभाएं
पदयात्रियों ने बताया कि सुदूर सीमा क्षेत्र से मां तनोटराय का आशीर्वाद लेकर शुरू हुई यह यात्रा मार्ग में आने वाले विभिन्न कस्बों और शहरों में ओरण सभाओं के माध्यम से जनजागरूकता फैलाएगी। जयपुर पहुंचते-पहुंचते हजारों लोग इस आंदोलन से जुड़ने की संभावना है।
राजस्थान में 25 हजार से अधिक ओरणें
पर्यावरणप्रेमी भोपाल सिंह झलोड़ा ने बताया कि अकेले जैसलमेर जिले में ही करीब 100 ओरणें हैं, जबकि पूरे राजस्थान में लगभग 25 हजार ओरणें मौजूद हैं। इनकी लाखों हेक्टेयर भूमि में से बहुत कम हिस्सा ही राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है। अधिकांश ओरणें ‘मुंह बोली’ हैं, जिन्हें दर्ज करने की मांग वर्षों से की जा रही है। उन्होंने बताया कि भारतीय वन्यजीव संस्थान की वर्ष 2020 की रिपोर्टों में भी ओरण क्षेत्रों को हो रहे नुकसान का उल्लेख किया गया है।
पर्यावरण और आजीविका पर संकट
पदयात्रियों का आरोप है कि मुंह बोली ओरणों में स्थानीय लोगों के परंपरागत अधिकारों की अनदेखी कर कंपनियों को भूमि आवंटित की जा रही है, जिससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है। इसका सीधा असर पशुपालकों की आजीविका, जल स्रोतों, आस्था स्थलों और खड़ीन खेती पर पड़ रहा है।
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