रासला, जैसलमेर / महेंद्र सिंह
सीमावर्ती जिले जैसलमेर की ग्राम पंचायत रासला में मनरेगा योजना के तहत बड़े स्तर पर अनियमितताओं और सरकारी धन के दुरुपयोग के गंभीर आरोप सामने आए हैं। केंद्र और राज्य सरकार जहां मनरेगा के माध्यम से ग्रामीणों को रोजगार की गारंटी देने का दावा कर रही है, वहीं रासला ग्राम पंचायत में इस योजना के नाम पर भ्रष्टाचार फलता-फूलता नजर आ रहा है। स्थानीय स्तर पर सामने आए दस्तावेज और मस्टररोल इस पूरे मामले पर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
एक ही फोटो से कई मस्टररोल भरने का आरोप
मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि मनरेगा के अलग-अलग मस्टररोल में नाम अलग-अलग हैं, लेकिन फोटो एक ही दिखाई दे रही है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार एक मस्टररोल में 10 मजदूरों के नाम दर्ज हैं, लेकिन उसमें जो फोटो अपलोड की गई है उसमें लोगों की संख्या और नामों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
जब दूसरा मस्टररोल देखा गया तो उसमें मजदूरों के नाम अलग पाए गए, लेकिन फोटो वही पहले वाली ही लगी हुई थी। यही स्थिति तीसरे मस्टररोल में भी देखने को मिली, जहां नाम फिर से बदल गए लेकिन फोटो वही दोहराई गई। इससे यह आशंका मजबूत हो रही है कि एक ही फोटो का उपयोग कर कई मस्टररोल तैयार किए जा रहे हैं और कागजों में मजदूर दिखाकर सरकारी फंड निकाला जा रहा है।

नाबालिगों के नाम पर भी रोजगार?
सरकारी वेबसाइट पर अपलोड फोटो में कुछ ऐसे चेहरे भी दिखाई दे रहे हैं जिनकी उम्र 18 वर्ष से कम प्रतीत हो रही है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि वे नाबालिग हैं तो उनका जॉब कार्ड कैसे बना और उन्हें मनरेगा में रोजगार कैसे मिल गया। मनरेगा के नियमों के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को इस योजना में मजदूरी करने की अनुमति नहीं होती।
सरकारी पोर्टल पर अपलोड फोटो से बढ़े सवाल
सबसे गंभीर बात यह है कि यह फोटो सरकारी पोर्टल पर अपलोड है, जिसका मतलब है कि इसे आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर संबंधित अधिकारियों ने इन मस्टररोल और फोटो का सत्यापन कैसे किया और बिना जांच के इन्हें मंजूरी कैसे दे दी गई।

ग्राम सेवक का बयान भी बढ़ा रहा संदेह
जब इस मामले को लेकर ग्राम पंचायत रासला के ग्राम सेवक से बात की गई तो उन्होंने कहा कि जिस दिन की फोटो है उस दिन ये मजदूर “एब्सेंट” थे। लेकिन यदि मजदूर अनुपस्थित थे तो फिर उनकी फोटो कैसे ली गई और उनकी उपस्थिति मस्टररोल में कैसे दर्ज हुई। इस बयान ने पूरे मामले को और भी संदिग्ध बना दिया है।
जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में संबंधित जेईएन (JEN) और अन्य उच्च स्तर के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। क्योंकि किसी भी मस्टररोल को अंतिम रूप देने से पहले तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर उसकी जांच होती है। ऐसे में यदि एक ही फोटो से कई मस्टररोल तैयार हुए हैं तो यह बिना अधिकारियों की जानकारी के संभव नहीं माना जा सकता।
सरकारी खजाने के दुरुपयोग की आशंका
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि एक ही फोटो के आधार पर कई मजदूरों के नाम दर्ज किए गए हैं तो इससे साफ है कि सरकारी खजाने का दुरुपयोग किया जा रहा है। जिन मजदूरों के नाम पर भुगतान किया गया, वह राशि आखिर किसके खाते में जा रही है, यह भी जांच का विषय बन गया है।
निष्पक्ष जांच की मांग
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि इस तरह की अनियमितताएं सामने आई हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना में हो रहे भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जा सके।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या रासला ग्राम पंचायत में मनरेगा के नाम पर हो रहे इस कथित भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होती है या नहीं।
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