विनोद छंगाणी / फलोदी
पश्चिमी राजस्थान की पहचान माने जाने वाले पारंपरिक व्यंजन केर-बाटा की मिठास अब धीरे-धीरे ग्रामीण इलाकों की थालियों से गायब होती जा रही है। कभी गांव-ढाणियों में आसानी से मिलने वाला यह स्वाद आज बाजार में महंगा और दुर्लभ होता जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मरुस्थलीय क्षेत्रों में तेजी से लग रहे सोलर प्लांट और बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स के कारण केर और बाटा के पौधे तेजी से समाप्त हो रहे हैं। यही वजह है कि जो केर-बाटा कभी 50 से 60 रुपये किलो बिकता था, वह आज बाजार में 400 से 500 रुपये किलो तक पहुंच गया है। पश्चिमी राजस्थान के फलोदी, जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर, बीकानेर जिले के ग्रामीण इलाकों में केर-बाटा लंबे समय से लोगों की भोजन संस्कृति का हिस्सा रहा है। होली के बाद चैत्र मास गर्मियों के मौसम में विशेष रूप से बनने वाली केर-बाटा की सब्जी को बाजरे की रोटी और छाछ के साथ बड़े चाव से खाया जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसके उत्पादन में भारी कमी आई है, जिससे इसकी उपलब्धता भी घटती जा रही है।
मरुधरा की पहचान रहा केर-बाटा
मरुस्थलीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले केर के छोटे-छोटे फल और बाटा (कच्चे जंगली फल) सदियों से यहां की भोजन परंपरा का हिस्सा रहे हैं। स्थानीय महिलाएं जंगलों और खाली भूमि में उगे इन पौधों से केर और बाटा एकत्रित करती थीं। फिर उन्हें सुखाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता था। सूखे केर-बाटा की सब्जी विशेष मसालों के साथ बनाई जाती है, जिसका स्वाद खट्टा-तीखा और बेहद लाजवाब होता है।
ग्रामीणों के अनुसार पहले केर-बाटा इतनी मात्रा में उपलब्ध होता था कि गांवों में इसका उपयोग सामान्य सब्जी की तरह किया जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। अब यह स्वाद केवल विशेष अवसरों या मेहमानों के आने पर ही देखने को मिलता है।
सोलर प्लांट से घटा प्राकृतिक क्षेत्र
स्थानीय किसानों और ग्रामीणों का कहना है कि पश्चिमी राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों में सौर ऊर्जा परियोजनाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। हजारों बीघा जमीन पर सोलर प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं। इन परियोजनाओं के लिए पहले से मौजूद झाड़ियां और वनस्पति साफ कर दी जाती है, जिनमें केर के पौधे भी शामिल होते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले जहां दूर-दूर तक केर की झाड़ियां दिखाई देती थीं, वहां अब सोलर पैनलों की कतारें नजर आती हैं। इससे न केवल केर-बाटा बल्कि अन्य कई जंगली पौधों की संख्या भी कम हो गई है। फलस्वरूप स्थानीय लोगों की आय और पारंपरिक खाद्य संसाधनों पर भी असर पड़ा है।
बाजार में कई गुना बढ़ी कीमत
केर-बाटा की घटती उपलब्धता का असर सीधे बाजार पर दिखाई दे रहा है। जहां कुछ वर्ष पहले यह 50 से 60 रुपये किलो बिकता था, वहीं अब इसकी कीमत 400 से 500 रुपये सूखे केर 1000 से 1500 रुपए किलो तक पहुंच गई है। कई जगहों पर अच्छी गुणवत्ता वाला केर तो 2000 रुपये किलो तक बिकने की जानकारी भी सामने आ रही है।
व्यापारियों का कहना है कि केर-बाटा अब पहले की तरह आसानी से नहीं मिलता। जंगलों और खाली जमीन में इसकी झाड़ियां कम हो गई हैं, इसलिए जो भी मात्रा बाजार में आती है, वह बहुत सीमित होती है। मांग ज्यादा और आपूर्ति कम होने से कीमतें लगातार बढ़ रही हैं।
आयुर्वेद में भी माना जाता है लाभकारी
केर केवल स्वाद के लिए ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी माना जाता है। आयुर्वेद में केर को कई रोगों के उपचार में उपयोगी बताया गया है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन और खनिज तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार केर पाचन तंत्र को मजबूत करता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है। इसके अलावा इसे मधुमेह नियंत्रण, त्वचा रोग और पेट संबंधी समस्याओं में भी उपयोगी माना जाता है। यही कारण है कि केर-बाटा को केवल एक व्यंजन नहीं बल्कि स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ के रूप में भी देखा जाता है।
केर-बाटा केवल भोजन का हिस्सा ही नहीं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। ग्रामीण महिलाएं जंगलों से केर एकत्रित करके स्थानीय बाजारों में बेचती थीं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होती थी। लेकिन अब केर के पौधों की कमी से यह आय का साधन भी धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है।
पर्यावरण प्रहरीयो, वृक्ष मित्र संस्था ने बताया कि यदि इसी तरह प्राकृतिक वनस्पति समाप्त होती रही तो आने वाले समय में केर-बाटा केवल बाजार में मिलने वाली महंगी वस्तु बनकर रह जाएगा और ग्रामीण क्षेत्रों की थाली से पूरी तरह गायब हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मरुस्थलीय क्षेत्रों की पारंपरिक वनस्पति को संरक्षित करना बेहद जरूरी है। केर जैसे पौधे सूखे और कठोर जलवायु में भी आसानी से उग जाते हैं, इसलिए इनका संरक्षण पर्यावरण के लिए भी लाभकारी है।
सोलर परियोजनाओं के साथ-साथ प्राकृतिक वनस्पति को बचाने की योजना बनाई जाए और केर के पौधों का व्यवस्थित रोपण किया जाए तो इस पारंपरिक स्वाद को बचाया जा सकता है। साथ ही स्थानीय लोगों को भी इससे रोजगार और आय के नए अवसर मिल सकते हैं।
परंपरा बचाने की चुनौती
पश्चिमी राजस्थान की संस्कृति और खान-पान में केर-बाटा का विशेष स्थान रहा है। यह केवल एक व्यंजन नहीं बल्कि मरुस्थल की जीवन शैली और प्रकृति के साथ तालमेल का प्रतीक भी है। लेकिन तेजी से बदलते विकास मॉडल और घटती प्राकृतिक वनस्पति के कारण यह परंपरा अब संकट में दिखाई दे रही है।
यदि समय रहते इसके संरक्षण की दिशा में प्रयास नहीं किए गए तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों और कहानियों में ही केर-बाटा का स्वाद जान पाएंगी। इसलिए जरूरत है कि विकास के साथ-साथ स्थानीय परंपराओं और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए भी गंभीर प्रयास किए जाएं, ताकि मरुधरा की थाली से केर-बाटा की यह मिठास हमेशा बनी रहे।
Discover more from THAR CHRONICLE
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

