अमृत सिंह डिग्गा
हिंदी साहित्य, राजस्थान विश्वविद्यालय
रेगिस्तान की तपती रेत पर जब जीवन की संभावनाएँ धुंधली पड़ने लगती हैं, तब यह अनुभूति होती है कि मरुभूमि केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि धैर्य, संघर्ष और संकल्प की अंतिम परीक्षा है। एक बार जब कोई मरुस्थल में प्रवेश करता है, तो उसे आगे ही बढ़ना पड़ता है; लौटने की संभावना अत्यंत क्षीण हो जाती है। जहाँ हरियाली समाप्त होती है, वहीं मनुष्य का संकल्प और जीवंतता आरंभ होती है।
कन्हैयालाल सेठिया की पंक्तियाँ इस मरु आत्मा को सजीव करती हैं—
“धरती सूखी, पाणी रूठियो,
पर मरूधरा रो मान न टूटो।
यह मरुस्थल तो हड्डियों का ढाँचा है, ओरण उसे मांसलता प्रदान करते हैं। ओरण ग्राम्य संस्कृति की अत्यंत प्राचीन परंपरा हैं। यह वह भू-भाग है जिसे किसी लोक देवी-देवता, वीर या संत को समर्पित कर दिया जाता है। ओरण.पारिस्थितिकी और कृषि पशुधन के विकास के लिए काम करने वाले एक संगठन कृषि एवं पारिस्थितिकी विकास संस्थान के अनुसार राज्य में अनुमानित 25 हजार ओरण है जिनका भौगोलिक विस्तार 6 लाख हेक्टेयर है.केवल पश्चिमी राजस्थान की बात करे तो यहां पर 9053 गांव में 5 लाख बीघा में 3017 ओरण है.अकेले जैसलमेर में लगभग 100 के करीब ओरण है.यहां पर भादरीयाराय ओरण, देगराय ओरण, आशापुरा ओरण देवीकोट, पाबूजी ओरण, कालेडूंगर राय ओरण, पन्नोधर राय ओरण, आईनाथजी ओरण, हडबू जी ओरण, नागणेची ओरण, नागाणाराय ओरण,सोहड़ा जी ओरण, विशन जी ओरण और डूंगरपीर जी ओरण आदि मुख्य हैं.सोनू गांव में स्थित बिकांसी जी के 13वीं सदी के ओरण में तो उनके पालतू कुत्ते और घोड़े के भी प्रतीक प्राप्त हुए है |
मरुभूमि की रेत में हमें मृगमरीचिका नहीं दिखाई देती, बल्कि आलाजी, पनराजजी, हनवंत जी भोमिया,मायथी, बिकांसी जी, मालण बाई, मूलचंद जी बीजा जी जैसे लोकदेवताओं का लहू और स्वेद दिखाई देता है, जिन्होंने इस मरुस्थल के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। विश्व इतिहास में मरुस्थल के प्रति ऐसा समर्पण और त्याग विरल है। यहाँ यह उक्ति पूर्णतः चरितार्थ होती है—
“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”
वर्तमान में गाँव एवं वहाँ की आबादी के अनुपात में अत्यन्त न्यून संख्या में ओरणें बची हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार 19.63 लाख की आबादी वाले बाड़मेर जिले के 28 हजार 387 वर्ग कि.मी. क्षेत्र के 10 हजार 996 हेक्टेयर कुल वनक्षेत्र में 250 ओरणें; 14.48 लाख की आबादी वाले जालोर जिले के 10 हजार 640 वर्ग कि.मी. क्षेत्र के 20 हजार 468 हेक्टेयर कुल वनक्षेत्र में 112 ओरणें; तथा 5.07 लाख की आबादी वाले जैसलमेर जिले के 38 हजार 401 वर्ग कि.मी. क्षेत्र के 6 हजार 201 हेक्टेयर कुल वनक्षेत्र में 30 ओरणें वर्तमान में अवस्थित हैं। इसी प्रकार 28.80 लाख की आबादी वाले जोधपुर जिले के 22 हजार 850 वर्ग कि.मी. के 4 हजार 336 हेक्टेयर कुल वनक्षेत्र में 25 ओरणें; 18.19 लाख की आबादी वाले पाली जिले के 12 हजार 387 वर्ग कि.मी. क्षेत्र के 84 हजार 500 हेक्टेयर कुल वनक्षेत्र में 55 ओरणें; तथा 8.50 लाख की आबादी वाले सिरोही जिले के 5 हजार 136 वर्ग कि.मी. क्षेत्र के 1.41 लाख हेक्टेयर कुल वन क्षेत्र में 90 ओरणों में से कुछेक को छोड़कर अधिकांश दयनीय अवस्था में भूखंडों के अत्यन्त न्यून क्षेत्रफल के रूप में उपेक्षित-सी अवस्थित हैं। राजस्थान मात्र में ही पाई जाने वाली ‘ओरण संस्कृति’ इन जिलों के अलावा नागौर, उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, राजसमन्द, अलवर, बारां, सीकर, भरतपुर, झूंझनू सवाई माधोपुर, दौसा, चित्तौड़ आदि जिलों के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में अल्प संख्या एवं न्यून क्षेत्रफल में अवस्थित हैं
मरुस्थल ने कभी शुष्क, नीरस और सूखे पेड़ों और वहां की मांओ ने कपूत पुत्रों को जन्म नहीं दिया | मेरा सौभाग्य है कि उन मांओ में से एक मेरी माताश्री (निजरो कंवर)का जन्म भी उस रेगिस्तान के कलरा कुआं ( राघवा गांव) में हुआ जिसके कारण मुझे और अनेको मरुस्थल के बेटों को अपनी भूमि अपनी के प्रति त्याग की भावना,संस्कृति और लोक देवताओं के प्रति समर्पण का भाव विरासत में मिला है | यह मरुस्थल के जीवन को बचाती है उनकी समझ पीढ़ियों की सीख है | रेगिस्तान का संतुलन वैज्ञानिक पुस्तकों से नहीं इन्हीं माताओं के अनुभव से टिका है | मैं अनुभव किया है मरुस्थल का सन्नाटा खाली नहीं होता उसमें ऊंटों और टोड़ियो की गुर्राहट , घेटियों- बकरियों की घटियो की वाणी, चरवाहों के गीत और हवा की सरसराहट खुली रहती है यहां का शांत वातावरण मनुष्य को अपने भीतर झांकने का अवसर देता है |

ओरण को यदि केवल देवभूमि, पवित्र वन या पर्यावरण संरक्षण भूमि कहा जाए तो यह उसके महत्व के साथ अन्याय होगा। वास्तव में ओरण वह मौन संविधान है, जिसे किसी राजा, संसद या कानून के शासकों ने नहीं, बल्कि लोक समाज की सामूहिक चेतना ने रचा। यह संविधान कागज़ पर नहीं, जनमानस के आचरण में लिखा गया। इसलिए यह सदियों तक जीवित रहा और समय के साथ इसके प्रति लोगों की श्रद्धा और विश्वास बढ़ता गया।
ओरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनकहा पक्ष यह है कि वे प्राचीन काल से ही सामाजिक न्याय के प्राकृतिक मंच रहे हैं। जिस समाज में अनेक स्थानों पर प्रवेश सीमित था और जलस्रोतों पर अधिकार तय थे, उसी समाज में ओरण में छाया, चारा और जल पर किसी का एकाधिकार नहीं था। संरक्षण सबकी सामूहिक जिम्मेदारी थी। यह वह लोकतंत्र था, जो लिखित संविधान से सदियों पूर्व अनपढ़, किंतु नैतिक और प्रकृति-प्रेमी समाज द्वारा स्थापित था।
ओरणों का सार्वजनिक और समावेशी चरित्र उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। जाति, वर्ग और आर्थिक भेद से परे सभी समुदायों को यहाँ समान अधिकार प्राप्त रहे। विशेषकर दलित, पशुपालक और वंचित वर्गों के लिए ओरण जीवनाधार रहे हैं। उन्होंने अपनी गोद में असंख्य पीढ़ियों का पालन-पोषण किया है। आज मरुस्थल के बेटे-बेटियाँ विश्व पटल पर जो पहचान बना रहे हैं, उसमें ओरणों का योगदान अविस्मरणीय है।
आज ओरण विकास की राजनीति में उपेक्षित हो रहे है |खनन, भूमि अधिग्रहण, प्रशासनिक उदासीनता और सबसे अधिक इन पवित्र भूमि को ‘बंजर भूमि’ मैं बदलने का काम किया है तो सौर ऊर्जा कंपनियों ने | यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि लोक संस्कृति के क्षरण का है सरकार के उदासीन रवैये ने ओरण के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है | जो वन कभी लोग संरक्षण में सुरक्षित थे| वे आज कागजों में ‘बंजर भूमि’ बनते जा रहे हैं | साहित्य में भी प्रकृति कभी दृश्य बनकर नहीं आती वह संवेदना बनकर आती है वही संवेदना मरुस्थल के लोक जीवन में ओरण के रूप में उभरी है| ओरण केवल वन नहीं है वह लोक चेतना द्वारा रची गई जीवित कविता है जिसमें पेड़ छंद है, छाया अर्थ और आस्था उसकी आत्मा | इसी संदर्भ में महान प्रकृति प्रेमी कवि सुमित्रानंदन पंत ने कहा है-
“प्रकृति नहीं है जड़ ,
वह जीवन की सहचरी है |”
भारतीय वन्यजीव संस्थान 2020 के अध्ययन में जैसलमेर क्षेत्र ने प्रति वर्ष 1000 वर्ग किमी में 20 हजार से अधिक पक्षियों की मृत्यु का अनुमान लगाया है.WII द्वारा 2020 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार , अध्ययन क्षेत्र में 4200 वर्ग किमी में 83,868 पक्षियों की मृत्यु का अनुमान लगाया है.इनमे से अधिकांश की मृत्यु यहां बिछी हाईटेंशन लाइन के कारण हो रही है.बगुले की लिटिल इग्रेट प्रजाति का पूरे भारत मे पहला मेलनिस्टिक किस्म का बगुला यहां देखा गया।यह विशेष प्रकार का बगुला है,किसी विशेष आनुवांशिकी बदलाव के कारण सफेद रंग की जगह काले-भूरे रंग का है.थार के विभिन्न क्षेत्रों में तिलोर, येलो आइड पीजन, कोरसर, पेलिकन, सोशियल लेपविंग, कुरजां, पेलिकेन की बहार है। ये पक्षी थार को समृद्ध करते हैं। ये राजस्थान के राज्य पक्षी गोड़ावण और तीतर, हिरण, सियार जैसे कई पशु-पक्षियों के रहने का ठिकाना भी है |
ओरण को बचाना केवल पेड़-पौधे ,जीव-जंतु को बचाना नहीं है बल्कि उस लोकबुद्धि को भी बचाना है | जिसने रेगिस्तान में जीवन को संभव बनाया | यदि ओरण समाप्त होंगे तो केवल हरियाली नहीं जाएगी, बल्कि मरू समाज की आत्मा भी सूख जाएगी | आज आवश्यकता है कि केंद्र और राज्य सरकारे ओरण को कानून ,नीति और चेतना तीनों स्तर पर प्रतिष्ठित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सके की
रेत के समुद्र में भी हरियाली एक सांस्कृतिक संकल्प हो सकती है
राज्य सरकार राजधर्म का अनुसरण करते हुए मरुस्थल के राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत, सरहद की प्रहरी, कर्मठ और ईमानदार जनमानस की भावनाओं और पर्यावरण के प्रति कर्तव्य की भावना से ओरण भूमि को संरक्षण प्रदान करें | मरुस्थल के लोगों द्वारा किए जा रहे ‘ओरण भूमि संरक्षण आंदोलन ‘ के प्रति राज्य सरकार संवेदनशील रवैया अपनाए और उन्हें अन्य रास्तों के लिए मजबूर न करें | श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा था –
“जब सभी उपाय निष्फल हो जाएँ,
तब तलवार उठाना धर्म है।”
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