केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव के अरावली के केवल 0.19% नई माइनिंग के दावे से ही खुल जाएंगी 27,200 नई वैध खदानें: अशोक गहलोत
क्रॉनिकल डेस्क / जयपुर
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव द्वारा अरावली क्षेत्र में केवल 0.19% नए खनन को लेकर कहा है कि यह फैसला पर्यावरण को बर्बाद करने वाला है। गहलोत ने कहा कि केंद्र सरकार ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ कर राजस्थान के पर्यावरण और संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाने की साजिश रच रही है। यद्यपि कल पूछे गए CEC को कमजोर करने एवं तीन दिन में सरिस्का का संरक्षित क्षेत्र बदलने के प्रयास कर खदानें शुरू करने के सवाल पर भूपेन्द्र यादव ने कोई जवाब नहीं दिया है।
गहलोत ने कहा कि केंद्रीय मंत्री का यह दावा कि खनन केवल 0.19% क्षेत्र में होगा, जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है क्योंकि वैध की आड़ में जो अवैध खनन होगा उसे रोकना किसी सरकार के बस की बात नहीं है।
आंकड़ों का खेल और असलियत
सरकार यह दावा कर रही है कि 1.44 लाख वर्ग किमी के कुल क्षेत्रफल का मात्र 0.19% खनन के लिए उपयोग होगा। लेकिन असलियत यह है कि इस 1.44 लाख वर्ग किमी में केवल पहाड़ नहीं हैं, बल्कि सरकार ने 34 जिलों के पूरे क्षेत्रफल (जिसमें शहर, गांव, खेत और मैदान भी शामिल हैं) को ‘अरावली क्षेत्र’ मान लिया है।
वास्तविक अरावली पर्वत श्रृंखला इतनी विस्तृत नहीं है। खनन केवल पहाड़ों पर होगा। 34 जिलों के कुल क्षेत्रफल के अनुपात में 0.19% सुनने में कम लगता है, लेकिन जब इसे जमीन पर उतारेंगे तो यह विनाशकारी होगा।
विनाश का गणित: 68,000 एकड़ और हजारों खदानें
गहलोत ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार के 0.19% का मतलब 273.6 वर्ग किमी यानी लगभग 68,000 एकड़ जमीन है। अगर छोटी खदानों (1 हेक्टेयर/2.5 एकड़) के पट्टे दिए जाते हैं, तो यहां 27,200 खदानें वैध तरीके से ही आवंटित हो जाएंगी।
खनन का असर सिर्फ खदान तक सीमित नहीं रहता। सड़कों का निर्माण, डंपिंग यार्ड, क्रशर और उड़ती धूल आसपास की लाखों एकड़ उपजाऊ जमीन और खेती तथा पूरे पर्यावरण को बर्बाद कर देगी।
- राज्यों के अधिकारों और संघीय ढांचे पर हमला
गहलोत ने केंद्र सरकार की द्वारा MMDR एक्ट में किए गए दो संशोधनों को राज्यों की स्वायत्तता पर हमला एवं अरावली को बर्बाद करने की साजिश बताया । MMDR संशोधन 2021 केंद्र ने यह नियम बनाकर राज्यों की शक्ति छीन ली है कि यदि राज्य सरकार समय पर नीलामी नहीं कर पाती, तो केंद्र सरकार खुद नीलामी कर देगी। यह राज्यों के प्राकृतिक संसाधनों पर जबरन कब्जे जैसा है। ऐसे में अगर अरावली में खनन पर कोई राज्य सरकार सहमति नहीं देगी तब भी केन्द्र सरकार वहां खनन शुरू करवा सकती है। - MMDR संशोधन 2023: ‘महत्वपूर्ण खनिजों’ (Critical Minerals) की आड़ में लिथियम, तांबा, और जिंक जैसे खनिजों की नीलामी का अधिकार राज्यों से छीन लिया गया है। अरावली में तांबा और जिंक जैसे खनिज गहराई में मिलते हैं। अब निजी कंपनियों को ‘एक्सप्लोरेशन लाइसेंस’ देकर अरावली को खोदने की खुली छूट दी जाएगी। गहलोत ने कहा कि माइनर और मेजर मिनरल्स की परिभाषा बदलकर और संरक्षित क्षेत्रों (Protected Areas) की बाउंड्री से छेड़छाड़ कर अरावली को खत्म करने की तैयारी की जा रही है।
MMDR एक्ट में बदलाव कर राज्यों की शक्ति सीमित करना, निजी कंपनियों को खनन का अधिकार देना, CEC को कमजोर करना, सरिस्का के संरक्षित क्षेत्र (Protected Area) में केवल 3 दिन में बदलाव का मॉडल बनाना अरावली को बर्बाद करने के लिए शुरू किया गया है। गहलोत ने आरोप लगाया कि 0.19% नहीं बल्कि 90% अरावली को बर्बाद करने की साज़िश की गई है।
गहलोत ने कहा कि हम राजस्थान के पर्यावरण, यहाँ की खेती और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को ‘कॉर्पोरेट मुनाफे’ की भेंट नहीं चढ़ने देंगे। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह अरावली को बचाना चाहती है या उसे बेचना चाहती है।
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