फलोदी | विनोद छंगाणी
पश्चिम राजस्थान, जो अपनी विशिष्ट भौगोलिक बनावट, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों और समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है, आज एक गंभीर पर्यावरणीय संकट से गुजर रहा है। मरुस्थलीय क्षेत्रों में हरित ऊर्जा के नाम पर तेजी से स्थापित हो रहे सोलर पावर प्लांट अब प्रकृति, वन्यजीवों और ग्रामीण जीवन के लिए खतरे का कारण बनते जा रहे हैं।
हरित ऊर्जा बनाम हरित विरासत
सरकार द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पश्चिम राजस्थान को सोलर हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, फलोदी और जालोर सहित कई जिलों में हजारों बीघा भूमि निजी कंपनियों को सोलर परियोजनाओं के लिए आवंटित की गई है। कागजों में भले ही यह भूमि बंजर या सरकारी दर्ज हो, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि यही क्षेत्र वर्षों से ओरण, गौचर और खड़ीन के रूप में स्थानीय समुदायों की जीवनरेखा रहे हैं।

ओरण, गौचर और खड़ीन का महत्व
ओरण धार्मिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण सामुदायिक भूमि होती है, जहां पेड़-पौधे, वन्यजीव और पक्षी सुरक्षित रहते हैं। गौचर भूमि पशुओं के चारागाह के रूप में उपयोग में आती है, जबकि खड़ीन पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली है, जो वर्षा जल को संचित कर खेती और भूजल रिचार्ज में अहम भूमिका निभाती है। इन तीनों के अस्तित्व पर संकट पूरे मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
जैव विविधता पर सीधा प्रहार
सोलर प्लांटों के लिए बड़े पैमाने पर भूमि समतलीकरण, पेड़ों और झाड़ियों की कटाई से प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। इसका असर चिंकारा, नीलगाय, रेगिस्तानी लोमड़ी, सियार, खरगोश जैसे वन्यजीवों के साथ-साथ गोडावण, मोर, तीतर, बाज, गिद्ध और प्रवासी पक्षियों पर साफ नजर आने लगा है। विशेषज्ञों के अनुसार सोलर पैनलों की चमक और ऊंची बाड़बंदी से पक्षियों के टकराने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
ग्रामीण आजीविका पर संकट
ओरण और गौचर भूमि केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी आधार हैं। पशुपालन पर निर्भर परिवारों को अब चारा खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे उनकी लागत बढ़ गई है। वहीं खड़ीन क्षेत्रों के नष्ट होने से वर्षा जल संचयन प्रभावित हुआ है, जिससे खेती और भूजल स्तर पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
पर्यावरण प्रहरियों का आंदोलन
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पर्यावरण प्रहरी, सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण संगठन ओरण, गौचर और खड़ीन बचाने के लिए एकजुट हो रहे हैं। विभिन्न जिलों में जनसभाएं, धरना-प्रदर्शन और ज्ञापन दिए जा रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे सोलर ऊर्जा के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर प्रकृति और पारंपरिक संसाधनों की बलि स्वीकार्य नहीं है।
नीतियों पर उठते सवाल
पर्यावरणविदों का मानना है कि मौजूदा नीतियों में स्थानीय समुदायों की सहमति और पारंपरिक ज्ञान को नजरअंदाज किया जा रहा है। कई मामलों में ग्राम सभाओं को विश्वास में लिए बिना भूमि आवंटन कर दिया जाता है, जिसकी जानकारी ग्रामीणों को काम शुरू होने के बाद मिलती है।
संतुलित विकास की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि सोलर परियोजनाएं छतों, औद्योगिक क्षेत्रों, नहरों के ऊपर या पहले से क्षतिग्रस्त भूमि पर स्थापित की जा सकती हैं। सामुदायिक भूमि और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को बचाना दीर्घकालीन हित में है।
पश्चिम राजस्थान की पहचान केवल रेगिस्तान नहीं, बल्कि उसकी जीवंत जैव विविधता, परंपरागत जल प्रणालियां और सामुदायिक संस्कृति है। यदि ओरण, गौचर और खड़ीन खत्म हो गए, तो यह आने वाली पीढ़ियों से उनकी प्राकृतिक विरासत छीन लेने जैसा होगा।
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