Wednesday, February 4, 2026
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पश्चिम राजस्थान में तालाब, ओरण और गौचर पर मंडराता संकट

भूमाफिया और अवैध खनन माफिया का बढ़ता वर्चस्व, प्रशासन की निष्क्रियता सवालों के घेरे में

फलोदी | विनोद छंगाणी

पश्चिम राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र अपनी विशिष्ट पर्यावरणीय संरचना के लिए जाना जाता है। यहां तालाब, ओरण और गौचर केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जल संरक्षण, पशुपालन, जैव विविधता और ग्रामीण जीवन की रीढ़ माने जाते हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों से इन सार्वजनिक और परंपरागत संसाधनों पर संकट के बादल गहराते जा रहे हैं। भूमाफिया और अवैध खनन माफिया की बढ़ती सक्रियता ने इन अमूल्य धरोहरों को गंभीर खतरे में डाल दिया है।

तालाबों पर अतिक्रमण, जल संरक्षण व्यवस्था चरमराई

क्षेत्र के अनेक तालाबों पर अतिक्रमण कर उन्हें निजी संपत्ति में तब्दील किया जा रहा है। कहीं चारदीवारी खड़ी कर प्लॉटिंग की जा रही है तो कहीं तालाब की पाल तोड़कर रास्ते और निर्माण कर दिए गए हैं। कभी पूरे गांव की प्यास बुझाने वाले ये तालाब आज कचरे और मलबे से अटे पड़े हैं। इसका सीधा असर भूजल स्तर, कृषि और पेयजल संकट पर साफ दिखाई देने लगा है।

ओरण भूमि पर अवैध खनन, पर्यावरण संतुलन बिगड़ा

परंपरागत रूप से देवस्थान और वन्य जीवों का आश्रय मानी जाने वाली ओरण भूमि भी अब भूमाफियाओं के निशाने पर है। कई क्षेत्रों में अवैध खनन कर पत्थर, बजरी और रेत निकाली जा रही है। इससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि स्थानीय वनस्पति और जीव-जंतुओं का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। कई स्थानों पर ओरण भूमि को कृषि या आवासीय क्षेत्र में बदलने के प्रयास सामने आए हैं।

गौचर भूमि सिमटी, पशुपालकों पर संकट

पशुओं की चराई के लिए आरक्षित गौचर भूमि पर भी अतिक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। पश्चिम राजस्थान का पशुपालक समुदाय गौचर पर निर्भर है, लेकिन अवैध कब्जों और खनन गतिविधियों के कारण चारे का संकट गहराता जा रहा है। इसका सीधा असर दुग्ध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

प्रशासनिक कार्रवाई पर उठ रहे सवाल

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन अवैध गतिविधियों के बावजूद प्रशासनिक कार्रवाई बेहद धीमी और औपचारिक नजर आती है। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों द्वारा बार-बार शिकायतें देने के बावजूद प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। कहीं-कहीं कार्रवाई होती भी है तो वह केवल खानापूर्ति तक सीमित रह जाती है।

चेतावनी दे रहे पर्यावरणविद

पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि समय रहते तालाब, ओरण और गौचर को संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में पश्चिम राजस्थान को गंभीर जल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने सरकार से सख्त कानून लागू करने, नियमित निगरानी और जनभागीदारी के साथ संरक्षण योजनाएं शुरू करने की मांग की है।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन भूमाफिया और खनन माफिया के दबाव से ऊपर उठकर इन अमूल्य संसाधनों को बचा पाएगा, या फिर विकास के नाम पर पश्चिम राजस्थान की पर्यावरणीय धरोहर यूं ही मिटती चली जाएगी।


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