Wednesday, February 4, 2026
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पक्षी दिवस काग़ज़ों में सिमटा, ज़मीनी संरक्षण अब भी चुनौती

फलोदी | विनोद छंगाणी

प्रदेश में हर वर्ष मनाया जाने वाला विश्व पक्षी दिवस पक्षियों के संरक्षण का संदेश तो देता है, लेकिन हकीकत में यह आयोजन अब औपचारिकताओं, सोशल मीडिया पोस्ट और काग़ज़ी कार्यक्रमों तक ही सीमित रह गया है। तेजी से बदलते पर्यावरण, शहरीकरण, प्रदूषण और मानवीय लापरवाही के चलते कई पक्षी प्रजातियां आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। जो पक्षी कभी सुबह की पहचान हुआ करते थे, उनकी चहचहाहट अब धीरे-धीरे खामोशी में बदलती जा रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार गौरैया, गिद्ध, तीतर, बटेर और नीलकंठ जैसी स्थानीय प्रजातियों की संख्या में चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई है। खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग, मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और जल स्रोतों का सूखना पक्षियों के जीवन पर सीधा प्रभाव डाल रहा है। वहीं मकर संक्रांति जैसे पर्वों पर उपयोग होने वाला प्रतिबंधित चाइनीज मांझा हर वर्ष सैकड़ों पक्षियों की जान ले रहा है।

पक्षी संरक्षण केवल भावनात्मक विषय नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता से जुड़ा अहम मुद्दा है। पक्षी परागण, कीट नियंत्रण और बीज प्रसार जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाते हैं। इनके बिना प्रकृति का संतुलन बिगड़ना तय है, जिसका सीधा असर मानव जीवन पर भी पड़ेगा।

दुखद स्थिति यह है कि आज भी कई स्थानों पर घायल पक्षी समय पर सहायता न मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं। पर्याप्त रेस्क्यू सेंटरों का अभाव, प्रशिक्षित कर्मियों की कमी और त्वरित सहायता तंत्र न होने से उपचार में देरी हो जाती है। हालांकि कई सामाजिक संगठन और पशु प्रेमी अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ये प्रयास जरूरत के मुकाबले नाकाफी हैं।

वृक्ष मित्र संस्था फलोदी ने बताया कि अब संरक्षण के संकल्प को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। स्थानीय स्तर पर पक्षी रेस्क्यू सेंटर स्थापित किए जाएं, पेड़-पौधों का संरक्षण हो, जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जाए और आमजन को पक्षियों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए। घरों की छतों पर पानी के परिंडे लगाना, सुरक्षित घोंसलों की व्यवस्था करना और प्रतिबंधित मांझे का उपयोग न करना जैसे छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

पक्षी दिवस तभी सार्थक होगा जब इसे केवल एक दिन का आयोजन न मानकर पूरे वर्ष की जिम्मेदारी समझा जाए। पक्षियों की सुरक्षा दरअसल भविष्य की सुरक्षा है और यह जिम्मेदारी समाज के हर वर्ग की साझा जिम्मेदारी है।


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