पोकरण | विशेष रिपोर्ट | थार क्रॉनिकल
एक ओर समाज डॉक्टर को भगवान का दर्जा देता है, जीवन रक्षक मानकर उस पर आंख मूंदकर भरोसा करता है, तो दूसरी ओर कुछ डॉक्टर इसी भरोसे को तोड़ते हुए अपने पेशे को खुलेआम बिजनेस में तब्दील कर देते हैं। ऐसा ही एक चौंकाने वाला, गंभीर और व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने वाला मामला पोकरण से सामने आया है, जिसने आमजन की संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है।
पोकरण में सरकारी सेवा में कार्यरत एम.डी. फिजिशियन डॉक्टर प्रकाश चौधरी पर बेहद गंभीर आरोप नहीं, बल्कि ठोस और प्रत्यक्ष वीडियो सबूतों के साथ हकीकत सामने आई है। आरोप यह नहीं, बल्कि कैमरे में कैद सच्चाई यह है कि डॉक्टर प्रकाश चौधरी ने सरकारी आवास को अवैध रूप से निजी अस्पताल में तब्दील कर दिया, जहां खुलेआम मरीजों को भर्ती कर इलाज किया जा रहा है और उनसे हजारों रुपये वसूले जा रहे हैं।

सरकारी मकान बना निजी अस्पताल, नियमों की खुली धज्जियां
वीडियो फुटेज में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि डॉक्टर प्रकाश चौधरी अपने सरकारी आवास के भीतर ही मरीजों को भर्ती कर रहे हैं। घर के कमरों में चारपाई लगाकर, आईवी स्टैंड मंगवाकर मरीजों को ड्रिप चढ़ाई जा रही है। किसी को दीवार पर लगाए गए ड्रिप से इलाज दिया जा रहा है, तो कहीं लकड़ी की बेंच पर बैठी महिला मरीज को सलाइन चढ़ाई जा रही है। यह नजारा किसी अधिकृत अस्पताल का नहीं, बल्कि एक अवैध, असुरक्षित और गैरकानूनी चिकित्सा केंद्र का है।

नेबुलाइजर, ड्रिप, इंजेक्शन – सब घर में!
इतना ही नहीं, एक अन्य वीडियो में दीवार पर टांगे गए नेबुलाइजर से मरीज को भाप देते हुए देखा जा सकता है। यह पूरा इलाज न तो किसी पंजीकृत अस्पताल के मानकों पर खरा उतरता है और न ही किसी मेडिकल गाइडलाइन के अनुरूप है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के अस्थायी और अस्वच्छ माहौल में ड्रिप, इंजेक्शन और नेबुलाइजेशन मरीज की जान के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
घर में ही लैब और ईसीजी सेंटर!
मामला यहीं खत्म नहीं होता। वीडियो सबूतों में यह भी स्पष्ट है कि डॉक्टर प्रकाश चौधरी ने अपने सरकारी आवास पर ही अवैध लैब का संचालन शुरू कर रखा है। ईसीजी मशीन लगाकर मरीजों के ईसीजी किए जा रहे हैं, शुगर जांच, खून की जांच सहित अन्य मेडिकल टेस्ट भी वहीं घर के भीतर ही किए जा रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या किसी सरकारी डॉक्टर को अपने सरकारी आवास में निजी लैब और डायग्नोस्टिक सेंटर चलाने की अनुमति है?

जब सब कुछ सरकारी अस्पताल में मुफ्त, तो घर में क्यों इलाज?
सबसे बड़ा और सबसे अहम सवाल यही है कि जब राजस्थान सरकार द्वारा सरकारी अस्पतालों में इलाज, दवाइयां और जांच पूरी तरह मुफ्त हैं, तो फिर मरीजों को सरकारी अस्पताल में भर्ती क्यों नहीं किया जा रहा? आखिर क्यों गरीब, मजबूर और बीमार मरीजों को सरकारी सुविधा से वंचित कर निजी तौर पर घर में इलाज कर मोटी रकम वसूली जा रही है? क्या यह सरकारी सेवा नियमों का खुला उल्लंघन नहीं है?
गंदगी, कचरा और संक्रमण का खतरा
वीडियो में डॉक्टर के सरकारी आवास की कार पार्किंग और आसपास का क्षेत्र भी साफ नजर आता है, जहां गंदगी, कचरा और अस्वच्छ माहौल पसरा हुआ है। ऐसे वातावरण में इलाज होना मरीजों के स्वास्थ्य और जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ है। संक्रमण फैलने का खतरा हर पल मंडरा रहा है, जिसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन पर सवाल
अब सवाल सिर्फ एक डॉक्टर तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि जिला चिकित्सालय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। जब वीडियो सबूत खुलेआम सामने हैं, तो अब तक इस डॉक्टर के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या सरकारी मकान को अस्पताल बनाना, घर में भर्ती कर ड्रिप-इंजेक्शन लगाना, लैब और ईसीजी सेंटर चलाना कानूनन सही है? अगर नहीं, तो फिर जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे क्यों बैठे हैं?
जनता में आक्रोश, जवाब की मांग
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद आमजन में आक्रोश है। लोग सवाल कर रहे हैं कि अगर यही हाल रहा तो सरकारी अस्पतालों की विश्वसनीयता कैसे बचेगी? क्या सरकारी डॉक्टरों पर कोई नियंत्रण नहीं है? क्या मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाना अब अपराध नहीं रहा?
PMO डॉ. अनिल गुप्ता का स्पष्ट बयान
इस मामले में जब थार क्रॉनिकल ने पोकरण जिला चिकित्सालय के पीएमओ डॉ. अनिल गुप्ता से बात की, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि
“कोई भी सरकारी डॉक्टर अपने आवास पर निजी चिकित्सालय, क्लिनिक या अस्पताल नहीं चला सकता। यदि ऐसा पाया जाता है, तो संबंधित डॉक्टर के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।”
थार क्रॉनिकल इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन व राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब की मांग करता है। जनता जानना चाहती है कि दोषियों पर कब कार्रवाई होगी और कब डॉक्टर को भगवान मानने वाली भावना का सम्मान बचाया जाएगा।
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