कुलदीप छंगाणी / जैसलमेर
अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर देश के प्रमुख पर्यावरण संगठन तरुण भारत संघ ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से स्वतः संज्ञान लेने की अपील की है। संगठन के अध्यक्ष और प्रसिद्ध जल संरक्षण कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर अरावली में जारी गतिविधियों पर गहरी चिंता जताई है। पत्र में कहा गया है कि अरावली केवल एक पहाड़ी श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत की प्राकृतिक जीवनरेखा है। यह पर्वतमाला भूजल रिचार्ज, जलवायु संतुलन, जैव विविधता और मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक प्राकृतिक संसाधन है। अरावली का क्षरण भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों पर सीधा हमला है।
अरावली: प्रकृति की धरोहर, मानव जीवन का आधार
तरुण भारत संघ ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि अरावली में वन, मिट्टी, जल स्रोत, वन्य जीव और पारंपरिक जीवनशैली एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन सबका संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। संगठन ने Public Trust Doctrine और Intergenerational Equity जैसे सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा राज्य और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी कर चुका है अरावली की रक्षा
पत्र में यह भी याद दिलाया गया कि वर्ष 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र में खनन पर रोक लगाकर ऐतिहासिक फैसला दिया था। उस फैसले ने अरावली को बचाने की दिशा में नई राह दिखाई थी, लेकिन वर्तमान हालात में एक बार फिर उसी न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
स्वतः संज्ञान लेकर सख्त निर्देश देने की मांग
राजेंद्र सिंह ने मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया है कि अरावली से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान ले और केंद्र व राज्य सरकारों को स्पष्ट व सख्त निर्देश दे, ताकि किसी भी प्रकार से अरावली की प्राकृतिक संरचना को नुकसान न पहुंचे। पत्र में कहा गया है कि यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में इसकी भरपाई संभव नहीं होगी।
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