कुलदीप छंगाणी / पोकरण
एक तरफ प्रदेश में बिजली विभाग बकाया बिलों की वसूली के लिए अभियान चला रहा है। जिन उपभोक्ताओं ने लंबे समय से बिजली बिल जमा नहीं किए, उनके कनेक्शन काटे जा रहे हैं। लेकिन जैसलमेर जिले के पोकरण में तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आ रही है, यहां सरकार के ही अधिकारी अपने बंगलों और सरकारी दफ्तरों की बिजली का भुगतान महीनों से नहीं कर रहे हैं। खबर लिखे जाने तक पोकरण के लगभग सभी प्रमुख सरकारी कार्यालयों पर बिजली विभाग का लाखों रुपये बकाया है।
नगरपालिका अध्यक्ष कार्यालय पर दिसंबर माह तक ₹1,36,133 बकाया। एसडीएम कार्यालय पर फरवरी माह तक ₹4,67,267 बकाया है जिसको लेकर पोकरण डिस्कॉम के सहायक अभियंता कार्यालय ने एसडीएम साहब से लिखित में नोटिस भेजकर विनम्र अनुरोध किया है कि कृपया अपने बकाया बिजली बिलों का भुगतान कीजिए । ऐसे ही पोकरण नगरपालिका मीटिंग हॉल पर दिसंबर माह तक ₹47,196 बकाया है । ये आंकड़े केवल उदाहरण हैं। सवाल यह है कि जब सरकार के ही कार्यालय अपने विभाग के बिलों का भुगतान नहीं करेंगे, तो राजकोष में धन की आवक कैसे होगी?

एसडीएम से लेकर ईओ तक—बंगलों पर भी लाखों का बकाया
केवल कार्यालय ही नहीं, बल्कि अधिकारियों के सरकारी आवास भी बकाया से अछूते नहीं हैं। नगरपालिका ईओ आवास पर जनवरी माह तक ₹2,27,383 बकाया।
एसडीएम आवास पर वर्तमान बकाया ₹30,045। जानकारी के अनुसार, कई बिल अनुमानित रीडिंग के आधार पर बनाए गए हैं, जिससे बकाया राशि और बढ़ने की संभावना है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, कई अधिकारी अपने कार्यकाल के दौरान सरकारी बंगलों में रहते हैं और स्थानांतरण के बाद बिना पूरा भुगतान किए ही दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि बिजली-पानी के बिलों का भुगतान न करना अब एक ‘प्रशासनिक परंपरा’ बनती जा रही है ।

अल्पसंख्यक छात्रावास का कनेक्शन काटा जा सकता है तो सरकारी अफसरों के आवास का क्यों नहीं ?
जब भणियाणा तहसील में अल्पसंख्यक छात्रावास का बिजली कनेक्शन बकाया के कारण काटा जा सकता है, तो क्या सरकारी अधिकारियों और दफ्तरों पर यह नियम लागू नहीं होता? क्या नियम केवल आम जनता और संस्थानों के लिए हैं? क्या सरकारी पद पर बैठते ही जवाबदेही समाप्त हो जाती है?
बिजली विभाग आम उपभोक्ताओं पर बकाया भुगतान न भरने पर लगातार कार्यवाही कर रहा जो राजकोष को भरने के लिए सही भी है लेकिन यह अपने ही प्रशासनिक तंत्र के सामने बेबस नजर आ रहा है। यदि समय रहते बकाया वसूली नहीं की गई तो यह न केवल विभागीय अनुशासन पर प्रश्नचिह्न है, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सीधा प्रहार है। अब देखना यह है कि संबंधित विभाग इन बकायों की वसूली के लिए क्या कदम उठाता है—या फिर आम जनता की तरह इन दफ्तरों के कनेक्शन काटने की हिम्मत भी दिखाता है?
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